प्यार की असल शुरुआत
आज वो थकी हुई आँखों से
कुछ कहना चाहती है मुझसे,
पर लगता है जैसे नाराज़ हो मुझसे,
शायद ग़ुस्सा निकाल रही हो मुझपर।
पर मैं जानता हूँ —
वो बस कहना चाहती है दिल की बात,
और उसे लगता है… मैं नहीं सुनता उसे।
मैं भी कहना चाहता हूँ बहुत कुछ,
पर अब पहले जैसा साहस नहीं रहा,
डर लगता है —
कहीं वो और नाराज़ न हो जाए।
कितनी बातें हैं जो तुमसे कहनी हैं,
पर हर बार खामोशी चुपचाप साथ चलती है।
सोचता हूँ — शायद चुप रहना बेहतर है,
कम से कम इसमें कोई शिकवा नहीं होगी।
कई बार सोचता हूँ —
क्यों कुछ सालों बाद रिश्ते यूँ बदल जाते हैं?
हम छोटी-छोटी बातों पर झगड़ने लगते हैं,
एक-दूजे को सिखाने लगते हैं —
ये सही है, ये गलत।
"तुम ये क्यों नहीं करते?"
"तुम वैसे क्यों हो?"
शिकायतें ही रह जाती हैं...
प्यार कहीं खो सा जाता है।
क्या यही प्यार की सच्चाई है?
या बस वक्त की ठंडी छाँव?
हम भूल जाते हैं —
हम इंसान हैं, कमियों से बने,
प्यार कमियाँ नहीं मिटाता,
बस उन्हें ढँक देता है अपनापन देकर।
साथ चलना — यही असल प्यार है,
जिसमें आकर्षण की जगह समझदारी होती है,
जिसमें खामियों के साथ जीना सीखते हैं।
शुरुआत तो अब होती है —
जब हम जानते हैं एक-दूजे की असलियत।
हाँ, हम बदलने की कोशिश करेंगे,
थोड़ा बदल भी पाएंगे शायद...
और जो ना बदल सके,
उसे समझौते की चादर ओढ़ा देंगे।
पर सवाल यह है —
क्या हम उस व्यक्ति से उतना ही प्रेम और सम्मान करते हैं,
जितना हम पाना चाहते हैं?
अगर हाँ —
तो फिर चलो याद करें वो पल,
जब साथ थे, मुस्कुराते थे,
जब बिना कहे भी एक-दूसरे का साथ दिया।
क्योंकि यही तो जीवन है,
यही तो प्यार है...
तुम और मैं — एक दूसरे के लिए।
....सुमित जेजुरीकर