Saturday, 15 February 2025

महाकुंभ

मन का कुंभ भरे तू पापी, क्या महाकुंभ में नहाए।

गंगाजी अब मैली होती, फिर साफ कभी ना होए।

जग सारा उमड़ा है तट पर, बस तस्वीर अपनी खिंचवाए।

वापस जाकर बनके पापी, कहे अब १४४ साल कुंभ ना आए।

....सुमित जेजुरीकर 

Monday, 10 February 2025

हिज़्र की घड़ियां

मोहब्बत की राहों में हिज्र की आई जो घड़ियाँ,

सिखा गईं हमको तेरी हर बारीकियाँ।

आँखों में जब से तेरा नूर नहीं दिखता,

हर शब उदास, हर सहर बेनूर सा लगता।


तेरी यादों का ख़ला है दिल के हर गोशे में,

हर लम्हा गुज़रता है एक नमुमकिन सी कोशिश में।

हमको जो यूँ दरकिनार किया तुमने,

अब दर्द के साए भी अजनबी से लगने लगे।


तू जहाँ भी रहे, आबाद रहे,

हमारी दुनिया में बस तेरी ख़ुशबू रहे।

तेरा हर लफ़्ज़ दिल में सदा महकता रहे,

और आरज़ू है हमारी, हम तेरी यादों में जिंदा रहें।

--- सुमित जेजुरीकर 


शब्दार्थ :

1. मोहब्बत – प्यार, प्रेम

2. हिज्र – जुदाई, वियोग

3. आँखें – नेत्र, नयन

4. नूर – रोशनी, प्रकाश

5. शब – रात

6. सहर – सुबह

7. ख़ला  – खालीपन, शून्यता 

8. गोशा  – कोना, स्थान

9. नमुमकिन – असंभव, जो संभव नहीं 

10. दरकिनार  – नज़रअंदाज़ करना, अलग करना

11. आबाद – समृद्ध, खुशहाल 

12. ख़ुशबू  – महक, सुगंध 

13. लफ़्ज़  – शब्द, वचन

14. आरज़ू – इच्छा, अभिलाषा