खोया रहता हूँ इस समंदर सा अपने ही ख़यालों में,
कितनी ही बातें दबी पड़ी हैं इसकी अनकही गहराइयों में।
जैसे लहरों की क़िस्मत है किनारे छूकर लौट जाना,
वैसे ही कुछ यादों की मिट्टी भीगती है, बस उतना ही निभाना।
तुझे देखकर लगता है कितना सुकून भरा है तेरा वजूद,
लोग तेरे किनारे आकर पा लेते हैं कुछ पल का सुकून।
पर शायद कुछ आँसू भी तू चुपचाप समेट लेता होगा,
तभी तो तेरा पानी खारा है, और दिल इतना सच्चा होगा।
मैं तुझे देखकर अब बस हैरान सा रह जाता हूँ,
न कोई परेशानी, न शिकायत — बस तुझे पढ़ जाता हूँ।
सोचता हूँ कितने तूफ़ान तू दिल में समेटे बैठा है,
रोज़ कितनी कश्तियाँ डूबती होंगी, फिर भी तू अडिग खड़ा है।
फिर क्यों इतना भाता है तू हर एक दिल को बार-बार,
क्या डर नहीं है किसी को, या खूबसूरती का है ये प्यार?
तुझसे बस इतना सीखना चाहता हूँ ऐ गहरे समंदर,
इतना सरल बन सकूँ मैं भी, कि मेरी ख़ामियाँ न डराएँ मुझे भीतर।
©सुमित जेजुरीकर