"मैं ज़िंदा तो हूँ, पर ज़िंदा नहीं"
यह मुराद कोई सुनता नहीं,
काफ़िर हम हैं.. या ज़माना, पता नहीं,
अकेले चले राहों में — कोई दूर तक दिखता नहीं।
कभी भीड़में भी अकेले होते है,
और शोर भी चुप-चुप रहता है।
ख़्वाइशे यूं दिल की तबाह करके,
हम मुस्कुराते हैं यूँ ही ग़म छुपाके।
इस सबकी हमको परवा नहीं,
मैं ज़िंदा तो हूँ — पर ज़िंदा नहीं।
अकेले चले राहों में — कोई दूर तक दिखता नहीं।
मैंने ढूँढे चेहरे बहुत अपनों से,
सब नज़र आए हमें परायों से।
सोचा कहें दिल खोल के इनसे,
पर लफ़्ज़ न आए इन होठोंसे।
सब पराए हैं — कोई अपना नहीं,
कोई राब्ता हमें अब इनसे नहीं।
अकेले चले राहों में — कोई दूर तक दिखता नहीं।
हमने चुने हमसफ़र कुछ अपने,
साथ चले न हम कदम लगे थमने।
कुछ ग़लती शायद हमारी भी उसमें,
कुछ अधूरी हमारी उनसे कसमें।
गर्दिशमें तारे कभी दिखते नहीं,
साथ चलते तो हैं — पर रुकते नहीं।
अकेले चले राहों में — कोई दूर तक दिखता नहीं।
अब बस कह दिया उन नज़ारों को,
राहों में दिखती ख़ूबसूरत बहारों को,
उन नदियों, वादियों, उन पहाड़ों को —
अकेला कितना बस देखूँ तुमको।
अब तुममें भी सुकून मुझे मिलता नहीं,
कुछ कहने की आदत में क्यों रखता नहीं।
जैसे ज़िंदा तो हूं— पर ज़िंदा नहीं,
मैं ज़िंदा तो हूँ, पर ज़िंदा नहीं
.....सुमित जेजुरीकर