अधूरी ज़िंदगी
ख्वाबों में उड़ता रहा मैं, कभी हकीकत ने रोका,
अपने ही डर से थमा मैं, कभी दुनिया ने टोका।
प्यार में खो गया था, जिसने छोड़ दिया साथ,
भरोसे ने ठुकराया, उजड़ गया कई रात।
कभी रिश्तों ने रोकी मेरी बढ़ती हुई राह,
कभी तंगी से थमा मैं, अधूरा मेरा गवाह।
कभी आलस ने जकड़ा, कभी हौसला हुआ कम,
कभी भरोसे ने लुट लिया, मन मेरा गया थम।
ज़िंदगी के रास्तों में, कई मौके खो गए,
कई सपने अधूरे रहे, कभी अरमान सो गए।
अब न गिला किसी से, न खुद पे कोई शिकवा है,
बीता कल बीता, अब साथ प्यार की मिठास है।
अपने सपनों का बोझ, न डालूँ किसी पे मैं,
उनको चुनने दूँ राह, उनकी गलती संभालूँ मैं।
खुश रहूँ मैं जो है पास, यही बस मेरी दुआ,
मिले जन्म एक और, तो खेलूँ फिर एक जुआ।
उम्र सही नहीं, पर मेहनत की लौ बाकी है,
जो खो गया कल, याद है, पर वक्त की राह बाकी है।
-©- सुमित जेजुरीकर