एक दिन अचानक वो आ गई नज़र के सामने।
कह दिया ख़ामोशी से लफ़्ज़-ए-आम आँखों ने।
भर आई पुरानी यादें उन पलकों की छाँव में।
दिन दोपहरी रातों की चाँद सितारों के साथ में।
लम्हा वो अधूरा था फिर भी नज़रें इतनी गहरी थीं।
तेरी साँसों से दिल तर जाने वाली डगर भी तो सुनहरी थी।
वैसे मुलाक़ात तो पुरानी है अपनी, पर अब तू पराई है।
पर आख़िरी वक़्त पर भीगा कंधा आज भी उतना गीला है।
तुम राह में मुझको छोड़ गई, साथ अधूरा छोड़ गई।
मैं सालों-साल वहीं खड़ा रहा, तू राह अपनी मोड़ गई।
संवर गया था अब तक मैं, कारवाँ नया था बसा लिया।
पर कभी-कभी भूले-भटके तुझको ढूँढा और खो गया।
सोचता हूँ तुम शायद मेरी होती तो क्या बात होती।
मैं यूँ आवारा होता या तेरी दीवानगी की रात होती।
आज देखो एक कोने में फिर भी तुम्हारी याद है।
मेरे टूटे दिल की दास्तान में आज भी तेरा नाम है।
इतना सालों का साथ था अपना, कैसे भूल भी जाओ तुम्हें।
मोहब्बत में हद कहाँ रखी थी, क्या-क्या किया अब बतलाऊँ तुम्हें।
पर तुम अब मेरी न रही, तो तेरी आन तो रखूँगा।
तू गुज़री पास से तो भी मैं तुमको न पहचानूँगा।
आज़ाद हुई गर तुम ख़ुद से और दुनिया की दुनियादारी से
और याद आई मेरी फिर उन दिल के गलियारों से।
मिलने के लिए वहीं पुरानी गलियों में चले आना।
लफ़्ज़ तो बस मेरे होंगे, तुम अपना वक़्त साथ लाना।
लफ़्ज़ तो बस मेरे होंगे, तुम अपना वक़्त साथ लाना।
कवि: सुमित जेजुरीकर
(“भेट” मराठी कविता का हिंदी–उर्दू संस्करण)
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