Monday, 11 February 2019

एकतरफा

होंटोपे ना आ पाया जो केहना था तुमसे कई बार।
लिख भी ना पाया हाल-ए-दिल कागज पे कितनी बार।

उस अनकहे रिश्ते को दिल के किसी कोने में मैंने था संभाला।
हां थोड़ी खता तो थी के तेरा हाथ मेरे हाथो से मिल ना पाया।

दोस्त तो मैं था जरूर पर कभी आगे हिम्मत ना कर सका।
शायद दूसरा नाम देनी की जरूरत महसूस ना कर सका।

लगा कभी अपने दिल की बात तुमसे कह ही दूं।
कहीं थोड़ा सा अपने जज्बातों की राह बदल दूं।

पर तुम क्या सोचती उसका मुझे लगता था डर।
प्यार के इजहार में खो ना जाए हमारी दोस्ती की डगर।

क्योंकि मेरी ना होते हुए भी तुम मेरी ही थी।
मेरे रूह में अपनी जगह बनाए तुम बैठी थी।

तुम्हे हंसते देखना मेरी एक आदत सी बन गई।
तुम्हारे आसुंको देखना जैसे कयामत आ गई।

हमारी दोस्ती में मुझको एक अलग सुकून मिल गया।
के उसे कुछ और रंग देने की मैं चाहत ही ना बना पाया।

कुछ तो हुई होगी गलती मुझेसे भी शायद उन राहों में।
जुदा हो गए हम दोनों और ना बचा कुछ इन पनाहों में।

लगा कि कुछ कहना था तुमको भी शायद मुझसे।
पर मैं ही अपना एकतरफा चलता रहा अपनी सोचसे।

आज कहानी कुछ अलग होती अगर तुम मेरी बाहोंमें होती।
पर क्या हमारी दोस्ती की दास्तां इतनी खूबसूरत सी होती।

....सुमित जेजुरीकर

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