क्यों मेरा मन आज कहीं खो सा गया है।
इस घनी सी धुंद में कहीं रुक सा गया है।
यह ओस की बूंदें दिलको रही भिगाती।
उसकी ठंडक मेरे मन को ऐसी लुभाती।
पता नहीं दिल में इतनी हलचल क्यों है।
जैसे शितल सागर में लेहेरे उमड़ती यूं है।
इन भीगी आंखोसे आंखे कभी मिलती नहीं।
तेरे फूलोंसे होटोंकी याद अभी तक जाती नहीं।
अब यह राहें हमसे तो बेगानी हो रही है।
तेरी यादें मेरी यादोंमेसे फनाह हो रही है।
इन धूंदलोसे रास्तों पे क्यों चलता मैं बेकरार।
अभी भी क्यों इस दिल को है तेरा इंतज़ार।
.. सुमित
इस घनी सी धुंद में कहीं रुक सा गया है।
यह ओस की बूंदें दिलको रही भिगाती।
उसकी ठंडक मेरे मन को ऐसी लुभाती।
पता नहीं दिल में इतनी हलचल क्यों है।
जैसे शितल सागर में लेहेरे उमड़ती यूं है।
इन भीगी आंखोसे आंखे कभी मिलती नहीं।
तेरे फूलोंसे होटोंकी याद अभी तक जाती नहीं।
अब यह राहें हमसे तो बेगानी हो रही है।
तेरी यादें मेरी यादोंमेसे फनाह हो रही है।
इन धूंदलोसे रास्तों पे क्यों चलता मैं बेकरार।
अभी भी क्यों इस दिल को है तेरा इंतज़ार।
.. सुमित
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