Tuesday, 3 March 2026

शायर

अगर तू मुझे सुनती, तो शायद शायर बनता मैं,

दिल की हर धड़कन को किसी शेर में लिखता मैं।


कुछ अल्फ़ाज़ थे जो लबों तक आते-आते रुक गए,

बस तू एक बार सुनती… तो सब कह देता मैं।


इतने नग़मे लिखे हैं लोगों ने प्यार के नाम पर,

ना चाँद, ना चाँदनी, ना बादल की बात करता मैं।

मेरी नज़रों से देखती अगर खुद को तू,

तुझे ख़ुदा से भी ऊपर रखा कहता मैं।


खुद को काफ़िर, तुझे अपना गुनाह कहता मैं,

तेरी हर सज़ा को भी इबादत समझता मैं।


अगर तू मुझे सुनती…

तो शायद शायर बनता मैं।

©सुमित जेजुरीकर 

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