Thursday, 19 March 2026

कर्जदार

किरायेदार हूँ ज़िंदगी का कब से, हँस के जी लेता हूँ,

बकाया जो भी बचा रह गया, खर्च के जी लेता हूँ।


कर्ज़दार हूँ ज़िंदगी का कब से, ये भी मान लेता हूँ,

हर साँस को खर्च करके, हिसाब भी देता हूँ।


ना कुछ अपना लाया था, ना कुछ साथ ले जाऊँगा,

जो पल मिला है हाथों में, उसे सजा लेता हूँ।


हिसाब-किताब नहीं रखा, ना कोई गिला रखा,

मैं तो बस आज में जीकर, मुस्कुरा लेता हूँ।


थोड़ी सी धूप मिली है, थोड़ा सा साया भी,

जितना भी मिला है मुझको, उसे ही लेता हूँ।


शिकायत क्यों करूँ इससे, ये सफ़र भी अपना है,

हर दर्द में जीने का एक सबक लेता हूँ।


शिकायत क्या करूँ तुझसे, ऐ ज़िंदगी मेरी,

जो एहसास तू देती है, वही लेता हूँ।


एहसानमंद हूँ तेरा, जीना जो सिखाया है,

हर दर्द को हँसते-हँसते, मैं पी लेता हूँ।


ये ज़िंदगी तेरी अमानत ही सही लेकिन,

हर रोज़ इसे जीकर, और क़र्ज़ सा लेता हूँ।


© सुमित जेजुरीकर

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